हम अक्सर सोचते हैं कि जिंदगी में जब वो मनपसंद चीज़ या कोई खास शख्स हमें मिल जाएगा, तो हमारी दुनिया मुकम्मल हो जाएगी। लेकिन क्या सच में ऐसा होता है?
पिछले कुछ दिनों से मेरा तिल और गुड़ के लड्डू खाने का बहुत मन था। मन में ऐसी तड़प और क्रेविंग्स (Cravings) थीं कि बस अभी मिल जाए! यह भी तय था कि इसे बाहर से नहीं मंगाना, बल्कि खुद अपने हाथों से घर पर बनाना है। पर एक छोटी सी उलझन थी—घर में गुड़ नहीं था। बाज़ार जाकर उसे लाने का आलस आ रहा था, इसलिए कुछ दिन बात टलती रही, लेकिन लड्डू खाने की वह चाहत मन में लगातार बनी रही।
आखिरकार कल मैं बाज़ार गई, गुड़ लेकर आई और पूरे चाव से रसोई में जाकर तिल-गुड़ के लड्डू बनाए। पूरी रसोई सोंधी खुशबू से भर गई और गोल-गोल सुंदर लड्डू बनकर तैयार हो गए। लेकिन जैसे ही वे डिब्बे में बंद हुए, एक अजीब सी बात हुई... मेरा उन्हें खाने का मन ही नहीं हुआ! जो चीज़ चंद घंटों पहले तक मेरी सबसे बड़ी चाहत थी, वह अब घर के एक कोने में रखी हुई थी, और मेरा मन पूरी तरह शांत था।
यह सिर्फ लड्डुओं की कहानी नहीं है...
तभी मुझे अहसास हुआ कि यही तो हमारी पूरी जिंदगी का फलसफा है। हम इंसानों की फितरत भी कितनी अजीब है! हम हर उस चीज़, उस सफलता या उस शख्स को पाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, जो हमारे पास नहीं होती और हमें बेहद पसंद होती है। उसके लिए हम अपना चैन, सुकून और रातों की नींद दांव पर लगाकर भरपूर मेहनत करते हैं। लेकिन जैसे ही वह चीज़ हमें हासिल हो जाती है, तो कुछ ही समय में उसका आकर्षण गायब हो जाता है। वह भी घर के किसी कोने में पड़ी उन जीतों की तरह हो जाती है, जिन्हें हम पाकर भूल चुके हैं।
और अगर बात किसी शख्स की हो, तो हमारे रिश्तों में भी यही होता है। किसी को अपनी जिंदगी में शामिल करने के लिए हम शुरुआत में जो तड़प और शिद्दत महसूस करते हैं, समय के साथ वह सब धुंधला पड़ने लगता है। शुरुआत का वह रोमांच, वह जादुई अहसास एक शांत ठहराव में बदल जाता है। जिसे पाने के लिए हमने पूरी कायनात से मिन्नतें की थीं, उसके पास होने पर हम अनजाने में उसे 'टेकन फॉर ग्रांटेड' (सहज उपलब्ध) मान लेते हैं।
ऐसा क्यों होता है कि जिस सफर की शुरुआत इतनी बेताबी से होती है, उसका अंत इस खालीपन पर आकर रुकता है?
'चाहत' का जादू और इंसानी दिमाग
मनोविज्ञान में इसे 'हेडोनिक ट्रेडमिल' (Hedonic Treadmill) या 'द परसूट पैराडॉक्स' (The Pursuit Paradox) कहा जाता है। हमारा मन असल में 'प्राप्ति' (Possession) से ज्यादा 'खोज' (The Chase) से आकर्षित होता है। जब तक कोई चीज़ हमसे दूर होती है, हमारा दिमाग उसकी एक काल्पनिक और जादुई छवि बना लेता है। लेकिन जैसे ही वह हमारी पहुंच में आती है, उसका रहस्य खत्म हो जाता है। जब तक गुड़ नहीं था, तब तक उसकी अहमियत सबसे ज्यादा थी। जैसे ही लड्डू बन गए, मन को तसल्ली हो गई और वह शांत हो गया।
तो फिर हमेशा तृप्त और आनंदित कैसे रहें?
अगर हर चाहत के पूरे होने का अंत एक खालीपन ही है, तो ऐसा क्या किया जाए जिससे हम भीतर से हमेशा भरा हुआ और आनंदित महसूस करें? इसका जवाब बाहर की दुनिया में नहीं, बल्कि हमारे नजरिए को बदलने में छिपा है:
सफर को ही मंजिल मान लेना: लड्डू बनने के बाद का स्वाद तो सिर्फ कुछ पलों का होता है, लेकिन बाज़ार जाकर गुड़ लाना, तिल को भूनना, उन्हें हाथों से बांधना—वह पूरी प्रक्रिया ही अपने आप में एक खूबसूरत अनुभव (Mindfulness) थी। जब हम परिणाम से ज्यादा उस सफर का आनंद लेने लगते हैं, तो खालीपन कभी हमारे पास नहीं फटकता।
खोज को बाहर से हटाकर भीतर मोड़ना: जब तक हमारी खुशी की चाबी बाहरी चीजों, सफलताओं या लोगों के हाथ में रहेगी, हमारा मन हमेशा उतार-चढ़ाव से गुजरता रहेगा। जब हम अपनी खुशी का आधार अपने भीतर के सुकून और विचारों को बना लेते हैं, तो बाहरी चीजों के आने-जाने से हमारा आंतरिक केंद्र नहीं हिलता।
अपेक्षाओं को छोड़ ठहराव को स्वीकारना: रिश्तों में शुरुआती रोमांच का कम होना स्वाभाविक है। इसे धुंधलापन समझने के बजाय, अगर हम इसे एक गहरा और सुरक्षित ठहराव मान लें, तो हम उस शांति में भी एक अलग आनंद ढूंढ पाएंगे। सामने वाले से यह उम्मीद छोड़ देना कि वह हमें हमेशा 'पूरा' महसूस कराए, हमें आजाद कर देता है।
साक्षी भाव (Witness Mode) में जीना: जिंदगी को एक कब्ज़े की तरह नहीं, बल्कि एक दर्शक की तरह देखना सीखें। चीजों और लोगों का आनंद लें, उनसे प्रेम करें, लेकिन उनसे इस कदर न जुड़ें कि उनके बिना आप खुद को अधूरा महसूस करने लगें।
अंत में...
भीतर का वह खालीपन जिससे हम अक्सर डरते हैं, कोई बीमारी नहीं है जिसे बाहरी चीजों से ठूंस-ठूंस कर भरा जाए। वह खालीपन असल में एक असीम, शांत आकाश की तरह है—शून्य और मुक्त। जब हम उस शून्य से डरना बंद कर देते हैं और बस शांत बैठकर खुद के साथ वक्त बिताना सीख जाते हैं, तब वही खालीपन 'परमानंद' में बदल जाता है।
लड्डू भले ही डिब्बे में बंद रखे हों, पर उन्हें बनाने की जो तड़प थी, वही हमारे जीवित होने और गहराई से महसूस कर पाने का असली सबूत थी। जिंदगी का असली जादू पाने में नहीं, बस इस 'होने' के अहसास में है।
आपकी कलम से, सखी ---
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